दर्शनशास्त्र के स्रोत

9789394902923

Rajkamal Prakashan, 1992

Language: Hindi

120 pages

Price INR 150.00
Book Club Price INR 127.00
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LWB1541

विश्व-दर्शन की मुख्य धारा में विभिन्न कालों के विभिन्न लोगों ने सकारात्मक या नकारात्मकअपने-अपने तरीक़े से योगदान किया है। इस मुख्य धारा में अनेक धाराएँ मिली हुई हैंजिनसे सामान्य पाठकों का परिचय कराने के लिए आठ पुस्तकों की यह शृंखला तैयार की गई है। प्रो. देवीप्रसाद चट्टोपाध्याय की प्रस्तुत पुस्तक इसी शृंखला की पहली कड़ी है।

श्री चट्टोपाध्याय इस पुस्तकमाला के प्रधान सम्पादक हैं और साथ ही दर्शनशास्त्र के स्रोत’ शीर्षक प्रस्तुत पुस्तक के लेखक भी। अत: उनकी यह पुस्तक एक प्रकार से पूरी शृंखला की पूर्व-पीठिका है। इस पुस्तक में उन्होंनेजैसा कि शीर्षक से स्पष्ट हैदर्शन के स्रोतों की खोज की हैऔर शृंखला की अगली पुस्तकों को पढ़ने-समझने का संस्कार पैदा करने की आधारशिला का निर्माण भी किया है। दर्शनशास्त्र की आवश्यकता क्यों है’ से प्रारम्भ करके वे आदि-मानव के क्रमिक विकास पर विचार करते हैं और फिर समाज में कर्म-विभाजन की शुरुआतनगर क्रान्तिजीवन में धर्म की भूमिका आदि को रेखांकित करते हुए इस प्रश्न पर विचार करते हैं कि दर्शन का जन्म और विकास कैसे हुआ। इस समस्त विवेचन के क्रम में विश्व की प्राचीन चिन्तन-पद्धतियों का संक्षिप्त परिचय भी पाठकों को मिल जाता है।

प्रो. चट्टोपाध्याय ने यहाँ थेल्स के बारे में किए गए इस दावे पर प्रश्न-चिह्न लगाया है कि वह पहला वैज्ञानिक था। ऐसा उन्होंने छान्दोग्य उपनिषद’ के उद्दालक आरुणि से सम्बन्धित अंश का विवेचन करते हुए किया है। उनके अनुसारउद्दालक आरुणि के विज्ञान के प्रति सुस्पष्ट रुझान को देखते हुए विश्व विज्ञान के इतिहास का गम्भीर पुनरीक्षण आवश्यक है।

कहना न होगा कि प्रो. चट्टोपाध्याय की सामाजिक दृष्टि और बौद्धिक तटस्थता से अनुप्राणित यह पुस्तक दर्शन के अध्येताओं के साथ-साथ उन पाठकों के लिए भी रुचिकर होगीजो दर्शन के अध्ययन की शुरुआत ही कर रहे हैं।

Debiprasad Chattopadhyaya

Late Professor Debiprasad Chattopadhyaya was an outstanding student of Indian philosophy in our times who was a self-proclaimed Marxist, itself unique. Until his death in 1993, he taught at the City College, Calcutta and published a large number of books in English and Bengali on a range of themes which opened up new vistas in the history, philosophy and social movements before scholars and the lay readers alike. Like a true Marxist, he looked upon creation of knowledge as a weapon of struggle for a better life for the masses.

Debiprasad Chattopadhyaya had earned his Doctorate from Calcutta University and had been conferred an Honorary D.Sc. by Moscow University. In his time, he was elected Member of the Academy of Sciences, (erstwhile) German Democratic Republic, Berlin, and National Fellow of the Indian Council of Philosophical Research for 1987-88. As Guest Scientist at the National Institute of Science, Technology and Development Studies, a CSIR constituent, he published the monumental History of Science and Technology in Ancient India. His Science and Society in Ancient India earned him praise from Professor Joseph Needham and was lauded in a review in Nature. His other prestigious books include Lokayata, Indian Atheism, What is Living and What is Dead in Indian Philosophy, Religion and Society, etc.