हल्ला बोल

सफ़दर हाश्मी की मौत और ज़िंदगी

Sudhanva Deshpande

Translated by Yogender Dutt

978-81-943579-4-0

वाम प्रकाशन, New Delhi, 2020

Language: Hindi

280 pages

5.5 x 8.5 inches

Price INR 325.00
Book Club Price INR 227.00
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‘मैं सफ़दर को बहुत चाहता था। वैसे, भला कौन उसे नहीं चाहता था? हम सभी उसकी दिलकश शख़्सियत, उसके सहज ठहाके, उसकी तमीज़ और तहज़ीब, सहज अभिव्यक्ति, स्पष्ट नज़रिए और कोमल मानवीय मूल्यों के क़ायल थे।’ – हबीब तनवीर

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‘मैं सफ़दर को बहुत चाहता था। वैसे, भला कौन उसे नहीं चाहता था? हम सभी उसकी दिलकश शख़्सियत, उसके सहज ठहाके, उसकी तमीज़ और तहज़ीब, सहज अभिव्यक्ति, स्पष्ट नज़रिए और कोमल मानवीय मूल्यों के क़ायल थे।’ – हबीब तनवीर

यह मौत की कहानी नहीं है। यह ज़िंदगी की कहानी है। एक सादालौह इंसान की दमकती, हसीन ज़िंदगी की कहानी, जितनी साधारण, उतनी ही असाधारण। सफ़दर हाश्मी की कहानी।

वह नया साल था। साल 1989 का पहला दिन। दिल्ली के एक बाहरी इलाक़े में नुक्कड़ नाटक के परफ़ॉर्मेंस के दौरान जन नाट्य मंच यानी जनम के समूह पर हमला किया गया। सफ़दर जनम के इस समूह का नेतृत्व कर रहा था। उस हमले ने जब उसकी जान ली तब वह सिर्फ़ 34 साल का था।

दिल दहना देने वाले उस हमले – जिसने सफ़दर को मार डाला – के चित्रण के साथ इस किताब की शुरुआत होती है और हमारा परिचय एक ऐसे इंसान से कराती है, जो कलाकार था, कॉमरेड था, कवि-लेखक, अभिनेता था और एक ऐसा इंसान था जिसे सभी चाहते थे, जो सबका प्यारा था। लेकिन यह किसी एक इंसान या किसी एक दुखद घटना पर लिखी गई किताब नहीं है। हल्ला बोल  यह बताती है और बेहद बारीक़ी से यह महसूस भी कराती है कि कैसे एक व्यक्ति की मौत और ज़िंदगी, तमाम दूसरे लोगों की कहानियों में गुंथी रहती है।

सफ़दर के बाद बड़ी हुई एक पूरी पीढ़ी के लिए हल्ला बोल  एक खज़ाना है। ऐसी कहानियों और ब्यौरों से भरा खज़ाना जो उस दिलचस्प आदमी के जुनून, हास्य, और इंसानियत को एक अंतरंग पोर्ट्रेट के तौर पर आपके सामने नुमायां करती है। सब मिलकर विचारधारा और ज़िंदगी के संघर्ष को आपस में जोड़ने वाली एक मज़बूत कड़ी को सामने लाती है। सफ़दर और उसके साथियों ने जो संघर्ष किए, वह वर्तमान भारतीय समाज को राह दिखाने वाली मशाल है।

जनम का नाटक हल्ला बोल  जो हमले के वक़्त झंडापुर में खेला जा रहा था, वह इस किताब में शामिल किया गया है।

इस किताब के लेखन पर हमारा ब्लॉग : The Journey of ‘Halla Bol: The Death and Life of Safdar Hashmi’

This book is also available in English.

Sudhanva Deshpande

Sudhanva Deshpande is a theatre director and actor. He joined Jana Natya Manch in 1987, and has acted in over 4,000 performances of over 80 plays. His articles and essays have appeared in The Drama Review, The Hindu, Frontline, Seminar, Economic and Political Weekly, Udbhavna, Samaj Prabodhan Patrika, among others. He has co-directed two films on the theatre legend Habib Tanvir and his company Naya Theatre. He is the editor of Theatre of the Streets: The Jana Natya Manch Experience (Janam 2007), and co-editor of Our Stage: Pleasures and Perils of Theatre Practice in India (Tulika 2008). He has held teaching positions at the National Institute of Design, Ahmedabad, and AJK Mass Communication Research Centre, Jamia Millia Islamia, New Delhi. Since 1998, he has been Managing Editor, LeftWord Books. He cycles around town.


Review

हल्ला बोल को आप बीच में नहीं छोड़ सकते। ये एक तेज़-रफ़्तार, सजीव शब्द चित्रों, घनी सरगर्मियों से भरी किताब है। इसे पढ़कर आप का दिल बैठने लगता है, मगर यह फ़िक्शन नहीं है। यह एक हरदिल अज़ीज़ इंसान की कहानी है – एक ऐसा कॉमरेड जिसके लिए इंसानियत पार्टी से बड़ी थी; एक कलाकार, शायर, लेखक, अदाकार, कार्यकर्ता; एक ऐसा इंसान जो अपनी उपलब्धियों के बोझ से भी कभी राह से नहीं डिगा। बेशुमार प्रतिभाओं वाला ऐसा व्यक्ति जिसे तमाम दुनिया उम्मीद भरी नज़रों से देखकर ये कह उठती : “लो, ये रहा नए दौर का इंसान!” और सुधन्वा के रूप में उसे एक बेहतरीन जीवनीकार मिल गया है।

आनंद पटवर्धन , फ़िल्मकार

एक नगीना। हल्ला बोल रंगमंच के बारे में है, संस्कृति, राजनीति और उम्मीद के बारे में है, और दिल को हिला देने वाली, आज के लिए बेहद ज़रूरी किताब है। अगर ये आपकी लाइब्रेरी में नहीं है तो समझिए कि वो लाइब्रेरी अधूरी है।

संजना कपूर , रंगकर्मी

आपस में कस कर गुंथे कई नैरेटिव्ज़ को लेकर हल्ला बोल तेज़ी से आगे बढ़ती है। ये सफ़दर हाश्मी का एक चमकदार शब्दचित्र है। यह किताब सांस्कृतिक व्यवहार और मज़दूर वर्गीय राजनीति के अंतर्संबंधों के बारे में है, और उन अंतर्संबंधों, उन चौराहों पर जी गई ज़िंदगियों का रोज़नामचा है। अलग-अलग नाटकों के बनने-बदलने के विवरणों, नुक्कड़ों-चौराहों-पार्कों में उनके मंचनके ब्यौरों से सजी इस किताब का कोमल, बहते पानी जैसा गद्य भी एक सुघड़ नाटक जैसा लगता है। एक दिलकश किताब!

एजाज़ अहमद, मार्क्सवादी चिंतक