Prabir Purkayastha is in Jail

On 3 October 2023, Prabir Purkayastha, the editor of Newsclick, was arrested by the Delhi Police. He has been in prison ever since then. Imprisonment is familiar to Prabir. In August 1975, three months into the Emergency, Prabir was detained on the campus of Jawaharlal Nehru University, where he was a student. As he recounts in Keeping Up With the Good Fight, he was picked up accidentally; the police was looking for someone else. He was nonetheless held under the Maintenance of Internal Security Act (MISA). Both in 1975 and 2023, Prabir fought to defend the rights enshrined in the Indian Constitution (1950), and yet he was arrested and held in prison.



We know what punishment the Indian government has visited upon Prabir – imprisonment. But we do not know his crime. What law has Prabir broken? He is being detained under the Unlawful Activities (Prevention) Act, whose latitude is so wide that it is impossible to fathom his crime with any exactitude. Over the past fifty years, Prabir has struggled to make Indian politics more democratic and to make Indian society more rational. He has led the people’s science and the free software movements, and he has been an active part in the movements to end war and suffering. None of this is a crime by any measure.

Since 2009, when he founded Newsclick, he has tried to enhance the public conversation about the great processes of our time. That, equally, is not a crime.

For us, at LeftWord Books, Prabir has encouraged our work as well as written and edited several books about science and about corporate corruption. Writing these books is not a crime.

In fact, there is no crime, because Prabir has not committed a crime. He is being punished. That is a fact. But neither he nor we know his crime. That too is a fact.

Ten days after Prabir’s arrest, eleven organisations (including Amnesty International, the Committee to Protect Journalists, and Reporters Without Borders) urged the Indian government to release journalists, calling the retaliation against Newsclick and Prabir ‘a grossly disproportionate measure’. They are absolutely correct.

We have decided to publish this note as an insert into Prabir’s books because we do not want to publish an edition with the note bound into the pages of the books. This act of putting in an insert reflects our optimistic hope that Prabir will soon be released and then we can remove these inserts from his books.

Sudhanva Deshpande & Vijay Prashad
Editors, LeftWord Books.


प्रबीर पुरकायस्थ जेल में हैं

 

3 अक्टूबर 2023 को ‘न्यूज़क्लिक’ के संपादक प्रबीर पुरकायस्थ को दिल्ली पुलिस ने गिरफ़्तार कर लिया। तब से वह जेल में हैं। प्रबीर कारावास से पहले से परिचित रहे हैं। अगस्त 1975 में, आपातकाल के तीन महीने बाद, प्रबीर को जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के परिसर में हिरासत में लिया गया, जहाँ वह छात्र थे। जैसा कि वह अपनी किताब आगे और लड़ाई है में बताते हैं, उन्हें ग़लती से पकड़ लिया गया था; पुलिस किसी और की तलाश कर रही थी। फिर भी उन्हें आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था अधिनियम (मीसा) के तहत हिरासत में रखा गया। 1975 और 2023 दोनों में, प्रबीर ने भारतीय संविधान (1950) में निहित अधिकारों की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी, फिर भी उन्हें गिरफ़्तार कर जेल में रखा गया।



हम जानते हैं कि भारत सरकार ने प्रबीर को क्या सज़ा दी है — कारावास। लेकिन हम उनका अपराध नहीं जानते। प्रबीर ने कौन सा कानून तोड़ा है? उन्हें गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम के तहत हिरासत में लिया गया है, जिसका दायरा इतना व्यापक है कि उनके अपराध को ठीक-ठीक समझना असंभव है। पिछले पचास वर्षों में, प्रबीर ने भारतीय राजनीति को अधिक लोकतांत्रिक और भारतीय समाज को ज़्यादा विवेकशील बनाने के लिए संघर्ष किया है। उन्होंने जन विज्ञान और मुफ्त सॉफ्टवेयर आंदोलनों का नेतृत्व किया है, और वह युद्ध तथा पीड़ा को समाप्त करने के आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी करते रहे हैं। इनमें से कोई भी किसी भी तरह से अपराध नहीं है।

2009 में ‘न्यूज़क्लिक’ की स्थापना के बाद से उन्होंने हमारे समय की अहम घटनाओं पर सार्वजनिक बहस को बढ़ाने का प्रयास किया है। और यह भी कोई अपराध नहीं है।

प्रबीर ने लेफ्टवर्ड बुक्स में हमारे काम को प्रोत्साहित किया है, साथ ही विज्ञान और कॉर्पोरेट भ्रष्टाचार पर कई किताबें लिखी और संपादित की हैं। ये किताबें लिखना भी कोई अपराध नहीं है।

दरअसल, कोई अपराध नहीं है क्योंकि प्रबीर ने कोई अपराध नहीं किया है। उन्हें सज़ा दी जा रही है, यह एक सच्चाई है। लेकिन न तो वह जानते हैं और न ही हम उनका अपराध जानते हैं। यह भी एक सच्चाई है।

प्रबीर की गिरफ्तारी के दस दिन बाद, ग्यारह संगठनों ( जिनमें एमनेस्टी इंटरनेशनल, द कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स और रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स शामिल हैं) ने भारत सरकार से पत्रकारों को रिहा करने का आग्रह किया, और न्यूज़क्लिक और प्रबीर के ख़िलाफ़ प्रतिशोध को ‘एक बेहद अनुचित कार्यवाही’ बताया। वे बिल्कुल सही हैं।

हमने अपनी इस टिप्पणी को प्रबीर की किताबों में अलग से डालने का फ़ैसला किया है, क्योंकि हम किताबों के पन्नों पर इसे प्रकाशित नहीं करना चाहते। इस तरह अलग से टिप्पणी डालकर हम यह उम्मीद ज़ाहिर करते हैं कि प्रबीर जल्द ही रिहा हो जाएंगे और हम टिप्पणी को उनकी पुस्तकों से हटा लेंगे।


सुधन्वा देशपांडे और विजय प्रशाद
संपादक, लेफ्टवर्ड बुक्स, 6 अप्रैल 2024