गुजरात के विधानसभा चुनाव के प्रचार से एक बात जो साफ़ हुई है वह यह है कि नरेन्द्र मोदी और बीजेपी का विकास का चेहरा महज एक छलावा भर है. इस चुनाव में कांग्रेस से मिल रही जबरदस्त टक्कर के बीच बीजेपी ने विकास को छोड़ अपना अल्पसंख्यक-विरोधी पैंतरा फिर से बेशर्मी से इस्तेमाल किया है. चाहे छोटे नेता हो या खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, अहमद पटेल को मुख्यमंत्री उम्मीदवार घोषित किये जाने की झूठी खबर को अपने भाषणों में हवा देना हो या सीधा-सीधा मुस्लिम समुदाय को टारगेट करते हुए बयान देना हो, हर कोई इस गन्दी राजनीति में एक दुसरे को पछाड़ने में लगा हुआ है. गुजरात के ऐसा राज्य है जहाँ आर.एस.एस. और वि.हि.प. कई दशकों से सक्रिय रहे है. आलम ये था कि आपातकाल के दौरान विपक्ष के नेता गुजरात में शरण ले रहे थे क्यूंकि गुजरात में गैर-कांग्रेसी सरकार थी और हिंदुत्व संगठन अपनी पैठ जमा रहे थे. गत वर्षों में इन संगठनों की सक्रियता के चलते गुजरात के शहरी इलाकों में कई सामजिक और धार्मिक परिवर्तन देखने को मिले हैं. नियमित न होकर ये परिवर्तन हिंदुत्व संगठनों की सोची-समझी रणनीति का एक हिस्सा भर हैं जिसमें समुदाय विशेष को टारगेट कर उसे शहर के एक कोने में धकेल दिया गया है. वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता तीस्ता सेतलवाड़ ने गुजरात में इस विषय पर उल्लेखनीय काम किया है. इस साल प्रकाशित हुए उनके संस्मरण, ‘तीस्ता सेतलवाड़: संविधान की सिपाही’ में उन्होंने इस पर फिर से प्रकाश डाला है. उसी संस्मरण का एक अंश हम यहाँ पब्लिश कर रहे हैं. जरूर पढ़िए.

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“2014 से हम गौ-तालिबान के वक्त में प्रवेश कर चुके हैं। जो अब भी भारत में हो रहा है, उसकी शुरुआत 16 साल पहले गुजरात में हुई थी। अब गौ-तालिबान, चिहित हिंसा की अपनी प्रवृत्ति में महारथ हासिल कर चुका है। तेज़ी से व्यवसायिक होते कॉरपोरेट मीडिया के लिए गहन और पृष्ठभूमि आधारित रिपोर्टिंग के लिए समय नहीं बचा है। जब हमारे समय के सर्वश्रेष्ठ मस्तिष्क हमारे पत्रकारिता के गुरु थे, बीट पत्रकारिता का अर्थ था कि हमने पूरा शोध किया हो, मुद्दे को आगे-पीछे से समझा हो, वर्तमान के अनुभवों को ठीक से सवाल किया हो और अतीत को प्रवृतियों को समझा हो। आज का मीडिया इतना भी करता, तो वह समझ पाता कि दादरी, लातेहार या उना में आसानी से उत्पीड़न या कत्ल कारण देने वाली मानसिकता के पहले प्रयोग की जड़े गुजरात में थी। उस समय ऐसा घटनाओं की अनदेखी की संस्कृति आज पूरे देश पर अपना शिकंजा कस चुकी है।

आर.एस.एस.-वि.हि.प. के हिन्दू राष्ट्र निर्माण के प्रोजेक्ट के लिए गुजरात हमेशा से अहम रहा है। 1966 में प्रकाशित (अब आर.एस.एस. की वेबसाइट पर मुफ्त डाउनलोड के ज़रिए सरलता से उपलब्ध) ‘गुरु’ एम. एस गोलवलकर की किताब ‘श्री गुरुजी समग्र‘ (अंग्रेजी में बंच ऑफ थॉट्स) में इस प्रोजेक्ट की स्पष्ट रूपरेखा है। गोलवलकर इस किताब में संविधान सभा के सदस्यों को सीधे संबोधित करते हैं, जिन्होंने देश का संविधान लिखा था, जो कि इस देश का क़ानून है।
वह ये भूल जाते हैं कि यहां पहले से ही हिंदुओं का एक प्राचीन राष्ट्र था, जहां विभिन्न समुदाय जैसे कि यहूदी और पारसी अतिथियों या फिर आक्रमणकारी मुस्लिम और ईसाई के तौर पर रह रहे थे। उनके सामने कभी यह सवाल नहीं था कि कैसे इतने विषम समूह, एक ही मिट्टी की संतानें कहला सकती थी, क्योंकि वह सभी एक साझा शत्रु के अधीन एक ही इलाके में निवास कर रहे थे।
आर.एस.एस. नेता लिखते हैं, ‘हम इस उपदेश मैं बहुत छले जा चुके कि हिंदुओं का महान विश्व बंधुत्व का दर्शन है, वह आत्मा से ही उदार है, इसलिए हमको मध्ययुगीन और साम्प्रदायिक हिन्दू राष्ट्रवाद जैसे विचार से खुद को संकीर्ण नहीं करना चाहिए।’ वह कहते हैं कि जो भी हिंदुत्व में विश्वास रखते हैं, ‘उनको इस चाल को समझ कर हमारे राष्ट्रवाद को प्राचीन तथ्य की तरह स्थापित कर के हिन्दू धर्म को भारत की राष्ट्रीय सामाजिकता के तौर पर स्थापित करना चाहिए, जैसा कि हमारे संगठन में राष्ट्रीय शब्द का इस्तेमाल करते समय हमारे संस्थापकों का साफ़ संदेश था। हमको अपनी सच्ची और पूरी सामर्थ्य से खड़े होकर, साफ कर देना चाहिए कि हम भारत में हिन्दू राष्ट्रीय जीवन पद्धति को प्रभुता और प्रतिष्ठा के उसी शिखर पर पहुंचाएंगे, जो आदिकाल से उसका जन्मसिद्ध अधिकार रहा है।’
हिन्दू राष्ट्र की इच्छा रखने वालों के लिए भारतीय संविधान एक गंभीर समस्या खड़ी करता है। 80 के दशक से, ख़ासकर 1995 में गुजरात में आर.एस.एस. की मानस संतान बी.जे.पी. के सत्ता में आने के बाद से, हिन्दू दक्षिणपंथ ने राज्य और समाज के संस्थानों को अपने एजेंडे के मुताबिक बेशर्मी और अशिष्टता से भ्रष्ट किया है। आस-पास के इलाक़ों और अलग स्थानों पर खुशी से रह रहे धार्मिक समुदायों को निशाना बना कर, उन्होंने शहर के भीतर सरहदें पैदा कर दी हैं। यहां तक कि अदालतें भी कड़वी प्रतिस्पर्धा की जगहें बन गयी हैं। राज्य की आबादी का लगभग दस फीसदी गुजराती मुसलमान, जगहों और सोच के घेट्टो (समुदाय विशेष की बस्ती) में एक अजीब सी लाचार स्थिति में रहते हैं। मुझे लगता है कि इसको जितना भारतीयों को झकझोरना चाहिए था, उतना इसने नहीं झकझोरा है। हम इस स्पष्ट सच्चाई के प्रति उदासीन रहे हैं। पश्चिमी मुस्लिमों के धड़ों के बीच एक जड़ता की मानसिकता घर करती जा रही है। अपने अस्तित्व के लिए पहला चुनाव घेट्टो में रहना होता जा रहा है। हालांकि ख़ुशक़िस्मती से अभी भी बहुतीं के लिए मामला ऐसा नहीं है।
बिज़नेस इंडिया के लिए काम करने के दौरान, मैन ऐसी दो घटनाएं कवर की, जिन्होंने इस नई सच्चाई की परतों को खोल दिया। अहमदाबाद के नारंगपुरा इलाक़े में एक मुस्लिम परिवार आंख की किरकिरी बना हुआ था। आखिर वह पुराने शहर से एक उच्च स्तरीय इलाक़े में कैसे जा कर रह सकते थे? 1991 के दंगों के चरम के दौर में, कुछ गुजराती हिन्दू औरतों ने एक ऐसे ही परिवार के, ओ.एन. जी. सी. के कर्मचारी श्री शेख को दूसरी मंज़िल की बालकनी से सीधे मौत के मुंह में धक्का दे दिया। उनकी मृत देह का संदेश साफ था, ‘यहां मुस्लिमों का रहना मना है।’ जुलाई 2016 में जब इस संस्मरण के संपादक, मेरी पांडुलिपि को ख़त्म कर पाने को लेकर खीझ रहे थे, मैने यह घटना नागपुर के एक खचाखच भरे सभागार में सुनाई। इस सार्वजनिक वक्तव्य के अंत में टाइम्स ऑफ इंडिया के संवाददाता (शिशिर आर्य), जो कि साफ़ तौर पर विचलित दिख रहे थे, मुझ से बात करने के लिए आए। हमने भीड़ से दूर जैसे ही कुछ वक्त निकाला, उन्होंने बताया कि नारंगपुरा की घटना के वक़्त वह 16 साल के थे और कक्षा 10 में पढ़ाई कर रहे थे। उन्होंने इस हाड़ कंपा देने वाली घटना में एक अंतिम कील वाली टिप्पणी जोड़ी और बताया कि शेख़ की हत्या के बाद, इस हत्या को अंजाम देने वाली महिला को सालाना दशहरा के नवरात्रि गरबा उत्सवों में सार्वजनिक रूप से सम्मानित किया गया था। गुजरात में हिन्दू आस्था का निर्मम चेहरा अपने धीमे लेकिन मजबूत कदमों से चलकर सामने आने लगा था।
अहमदाबाद में वी.हि.प. एक नक़्शा बांटा करती थी, जो उनके स्वप्नलोक को दिखाता था। वह नक़्शे मैं, शहर के पुराने हिस्से को हरा और नए हिस्से को भगवा रंग में रंग दिया करते थे। मकसद ये था कि भगवा हिस्सा, हरे हिस्से को पराजित कर दे- यानी कि हिन्दू, मुस्लिमों पर हावी हो जाएं। इन फ़ासीवादियों की क्रूरता का निशाना, हिन्दू-मुस्लिम और अंतर्जातीय विवाह भी बनने लगे। वह ये भी थोपने लगे कि कौन कहाँ रहेगा और कैसे रहेगा। कुछ ऐसे नवयुगल, जिन्होंने अंतरजातीय या अंतर्धार्मिक विवाह किया था, वह सुरक्षित रहने के लिए मुस्लिम घेट्टो में रहने लगे।
आज, पुराना अहमदाबाद रीयल एस्टेट का महँगा इलाका है। गुजरातियों ने अपने स्वभाव के मुताबिक, व्यापारिक संभावनाओं को ओहचान लिया है, पुरानी हवेलियों को पारंपरिक धरोहर कर रूप में संवार दिया है। गायकवाड़ हवेली में बने हुए, क्राइम ब्रांच के दफ्तर को भी साफ-सुथरा कर के नया रूप डें दिया गया है। हालांकि कड़वा सच ये भी है कि बाहरी स्थापत्य के चराग़ों के ताले बानी अंदर की कोठरियों में बहुत अंधेरा है और वहां डरावने काम होते हैं।”
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